चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .

Wednesday, June 18, 2008

चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
चाहते इन्तहा मेरा ,दिल के इन्तहा
से क्या फायदा .
चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
दर्द दे के भी खुशिया मिले तुमको यारा,
दुआ दे ये तडपता दिल हमारा.
दवा दे के जख्म देने का क्या कायदा ,
चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
गम ले ले के हम गमगीन हों ,
पर तेरी हर शाम रंगीन हों .
हम तो जले ही , जले को जलने से क्या फायदा
चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
फूल भी हम को चुभन दे ,जलाये हमे.
हवा भी हम को सलन दे व सलाये हमे
दुआए तुमको लगे वा हमको बददुआ .
चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
जाने हमको सबेरा की चाहत नहीं ,
हम तो अंधड़ में दुनिया मिटा देंगे .
फिर तनिक सी रौशनी का क्या कायदा
चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,

12 comments:

प्रवीन जी,
पहली सहमति तो आपके ब्लॉग के शीर्षक के साथ ही...
जीवन यकीनन एक कविता है... और अगर ऐसा न भी हो तो ऐसा होने का भाव तो है ही... नये ब्लॉग के लिए बधाईयां... ब्लॉगवाणी पर रजिस्ट्रेशन करा लें जिससे सभी पाठक आपको पढ़ सकें... कविता अच्छी है, कुछ चीजों पर और ध्यान लगा लें तो मजा आ जाएगा... जैसे बो मिल न सकी, की जगह 'वो' मिल न सकी हो तो अच्छा लगेगा...

आपका मित्र
खबरी

Nirmla Kapila said...

parveen ji mere blog par comment dene ke liye dhanyvad magar mai kavita nahin hoon vo meri kahani ki nayika hai shayad apne kahani dhian se nahin padhi apki rachna achhi lagi shubhkamnayen

namaskar mitr,

aapki saari posts padhi , aapki kavitao me jo bhaav abhivyakt hote hai ..wo bahut gahre hote hai .. aapko dil se badhai ..

is kavita ne to dil me ek ahsaas ko janam de diya hai ..

dhanyawad.....

meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

aapka

Vijay

इतना बढिया लिखा है आपने...लेकिन साल भर से ये ब्लौग अछूता क्यों है? कोई पोस्ट क्यों नहीं डाली?

bahut hi bhawpuran kawita jisame dard ki inteha hai dost .........bahut badhiya

चाह थी जिसकी बो मिल ना सकी .
अनचहे से मिलन का क्या फायदा ,
kavita ki shuraat bahut achchhi hai.badhaai.

जिन्दगी की सच्चाई को बयान करती सुन्दर एवं सार्थक रचना !!!! धन्यवाद
प्रदीप मानोरिया
09425132060

आप लिख ही नहीं रहें हैं, सशक्त लिख रहे हैं. आपकी हर पोस्ट नए जज्बे के साथ पाठकों का स्वागत कर रही है...यही क्रम बनायें रखें...बधाई !!
___________________________________
"शब्द-शिखर" पर देखें- "सावन के बहाने कजरी के बोल"...और आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाएं !!

रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

Shama said...

Pehlee baar aayee hun aapke blogpe bohot manse likha hai aapne..aur kya kahun?

word verification hata den to achha rahega..(comment deneke lihaaz se..anytha na len)!
http://shamasansmaran.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

http://shama-baagwaanee.blogspot.com

Any URL ke links in blogs pe milhee jayenge...snehil nimantran hai..

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

प्रविणजी! आपकी कमेन्टस आपकी रचना कि तरहां ही इतनी अदभूत होती हैं। ये मज़ाक नहिं है क्योंकि आप ईस तरहां हर रचना को सराहते- संवारते हैं कि जिससे इंस्पीरेशन मिलती है।वाह ! अदभूत रचना!!!